राष्ट्रपति का ‘न्यू इंडिया’

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स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर बोलते हुए देश के नव निर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने देश के नाम अपने पहले संबोधन में ‘न्यू इंडियाÓ को परिभाषित करते हुए कहा कि देश के लिए अपने जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा लेकर आगे बढऩे और देश के लिए कुछ कर गुजरने की उसी भावना के साथ राष्ट्र निर्माण में सतत जुटे रहने का समय है। राष्ट्रपति कोविंद ने कहा, स्वतंत्रता नैतिकता पर आधारित नीतियों और योजनाओं को लागू करने पर उनका जोर, एकता और अनुशासन में उनका दृढ़ विश्वास, विरासत और विज्ञान के समन्वय में उनकी आस्था, विधि के अनुसार शासन और शिक्षा को प्रोत्साहन, इन सभी के मूल में नागरिकों और सरकार के बीच साझेदारी की अवधारणा थी। उन्होंने आगे कहा, यही साझेदारी हमारे राष्ट्र-निर्माण का आधार रही है। नागरिक और सरकार के बीच साझेदारी, व्यक्ति और समाज के बीच साझेदारी, परिवार और एक बड़े समुदाय के बीच साझेदारी। उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण के लिए ऐसे कर्मठ लोगों के साथ सभी को जुडऩा चाहिए, साथ ही सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का लाभ हर तबके तक पहुंचे इसके लिए एकजुट होकर काम करना चाहिए। इसके लिए नागरिकों और सरकार के बीच साझेदारी महत्वपूर्ण है।

कोविंद ने सरकार के ‘स्वच्छ भारत’ अभियान, ‘खुले में शौच से मुक्त’ कराना, इंटरनेट का सही उद्देश्य के लिए उपयोग करना, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान का जिक्र किया। उन्होंने कहा, सरकार कानून बना सकती है और कानून लागू करने की प्रक्रिया को मजबूत कर सकती है लेकिन कानून का पालन करने वाला नागरिक बनना, कानून का पालन करने वाले समाज का निर्माण करना हममें से हर एक की जिम्मेदारी है। रोजमर्रा की जिन्दगी में अपने अंत:करण को साफ रखते हुए कार्य करना, कार्य संस्कृति को पवित्र बनाए रखना, हममें से हर एक की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि आजादी केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं था, बल्कि वह एक बहुत बड़े और व्यापक बदलाव की घड़ी थी। वह हमारे समूचे देश के सपनों को साकार होने का पल था, ऐसे सपने जो हमारे पूर्वजों और स्वतंत्रता सेनानियों ने देखे थे। स्वतंत्र भारत का उनका सपना, हमारे गांव, गरीब और देश के समग्र विकास का सपना था।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जिस ‘न्यू इंडिया’ का सपना देखा है उसका आधार डा. अम्बेडकर के विचार ही हंै। डा. अम्बेडकर ने कहा था भोजन, वस्त्र और मकान प्राप्त करना आपका जन्म सिद्ध अधिकार है और वह भी सम्मान रूप से। ‘सरकार का मुख्य दायित्व यह है कि वह गरीबी की समस्या का समाधान करे। सरकार को यह देखना चाहिए कि वह ऐसे उपायों को अपनाए, जिनसे…..अधिकांश लोग सुविधाओं के साथ रहने लगें, उन सुविधाओं के साथ जो….सभ्य कहे जाने वाले लोगों के लिए अति आवश्यक हैं। हमारी सरकार ऐसी होनी चाहिए जिसमें सत्ताधारी व्यक्ति एकबद्ध होकर अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा देश के सर्वोत्तम हित में लगा सके। हमारी सरकार ऐसी होनी चाहिए जिसमें सत्ता में बैठे लोग, जहां अवज्ञा के साथ विरोध हुआ हो, वहां सामाजिक और आर्थिक जीवन के लिए आवश्यक न्याय की स्थापनार्थ कार्य करेंगे। मेरी राय यह है कि आज समय की सबसे बड़ी मांग यह है कि जनता जर्नादन के मन में एक साझी राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न की जाए।… इस आदर्श के चलते हमें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जिससे स्थानीय…वर्ग चेतना की भावना कट्टर हो। यदि समाजवाद को वास्तविक बनाना है तो यह मानना ही होगा कि सामाजिक सुधारों की समस्या इस मार्ग में सबसे महत्त्वपूर्ण है, और इससे दूर नहीं भागा जा सकता है।

जब तक समाजवादी इस वास्तविकता को अंगीकार नहीं करते हैं, वे अपना ध्येय प्राप्त नहीं कर सकते। हिन्दू समाज, एकता और जाति-विहीनता के सिद्धान्त पर आधारित हो, केवल अन्तर्जातीय विवाह या सामूहिक भोज अस्पृश्यता को नहीं मिटा सकते हैं, साथ ही आर्थिक क्षेत्रों और शासकीय कार्यों में अवसरों की समानता भी इस हेतु आवश्यक है और राजनीति भी इस प्रकार हो कि उसमें मानवाधिकारों की समान रूप से सुरक्षा की प्रत्याभूति हो, किसी के अधिकारों का हनन न हो। समाज भी निरन्तर परिवर्तन की परिधि में है। इसलिए यह कैसे संभव है कि इसके नियमों या व्यवस्थाओं को, जो सैंकड़ों-हजारों वर्ष पूर्व स्थापित की गई हों, इस तर्क के आधार पर कि वे बहुत अच्छी थीं, बनाए रखा जाए? उन्हें बनाए रखना हो तो परिवर्तित स्थिति और मांग के अनुरूप तो बनाना ही होगा। न्यायपूर्ण समानता चाहने वाले स्वीकार करते हैं कि इसके अन्तर्गत उन लोगों को, जिनका स्तर समाज में बहुत निम्न है, ऊपर उठाना है, उन लोगों को उच्च सामाजिक-आर्थिक स्तर वालों के समान बनाने का प्रयास करना है। जब तक स्तर की बराबरी नहीं होती, तब तक समानता सच्चे अर्थों में स्थापित नहीं हो सकती है। समानता, वास्तव में, सब स्तरों पर समानता होती है, किसी एक या कुछ स्तरों पर ही समानता नहीं होती। मेरा सामाजिक दर्शन, संक्षेप में, तीन शब्दों-स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे में देखा जा सकता है, मैंने इसे कहीं से उधार नहीं लिया है। मेरे दर्शन की जड़ें धर्म में हैं, न कि राजनीति विज्ञान में। इसे मैंने अपने (गुरु) अध्यापक (महान) बुद्ध की शिक्षाओं से पाया है। यदि हम वास्तव में एकता स्थापित करने के उपाय ढूंढना चाहते हैं, तो हमें सामाजिक बंधनों को तोड़ देना होगा।….इस सन्दर्भ में हिन्दू समुदाय को पहल करनी होगी…।’

राष्ट्रपति कोविन्द ने ‘न्यू इंडिया’ को लेकर कहा कि ‘न्यू इंडिया’ का अभिप्राय है कि हम जहां पर खड़े हैं, वहां से आगे जाएं। तभी हम ऐसे ‘न्यू इंडिया’ का निर्माण कर पाएंगे जिस पर हम सब गर्व कर सकें। उन्होंने कहा, मुझे पूरा भरोसा है कि नागरिकों और सरकार के बीच मजबूत साझेदारी के बल पर ‘न्यू इंडिया’ के इन लक्ष्यों को हम अवश्य हासिल करेंगे। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा ‘न्यू इंडिया’ बने जहां हर व्यक्ति की पूरी क्षमता उजागर हो सके। राष्ट्रपति ने जो सपना संजोया है वह तभी साकार होगा, जब हम राष्ट्रहित को सम्मुख रख निर्णय लेंगे।