Youth Darpan December 6, 2017
श्री राधा मोहन सिंह ने किसानों की सुविधा के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड एप लांच किया गया
श्री राधा मोहन सिंह ने विश्व मृदा दिवस के अवसर पर कृषि विज्ञान केन्द्र झज्जर में किसानों को सम्बोधित किया
केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री, श्री राधा मोहन सिंह ने विश्व मृदा दिवस के अवसर पर कहा है कि स्वायल हेल्थ कार्ड योजना का उद्देश्य देश के सभी किसानों की 12 करोड़ जोतों के सॉयल हेल्थ के विषय में जानकारी प्रदान करना है। श्री सिंह ने यह बात कृषि विज्ञान केन्द्र, झज्जर में विश्व मृदा दिवस के अवसर पर कही। उल्लेखनीय है कि हर वर्ष 5 दिसम्बर को विश्व मृदा दिवस मनाया जाता है। भारत में मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की शुरुआत फरवरी, 2015 में राजस्थान में की गई थी। केन्द्रीय कृषि मंत्री ने जानकारी दी कि किसानों की मदद के लिए आज मृदा स्वास्थ्य कार्ड एप लांच किया गया। इस ऐप से क्षेत्र स्तर के कार्यकर्ताओं को लाभ होगा। नमूना संग्रह के समय फील्ड से नमूना पंजीकरण विवरण कैप्चर करने में यह मोबाइल ऐप स्वचालित रूप से जीआईएस समन्वय को कैप्चर करता है और उस स्थान को इंगित करता है जहां से क्षेत्र के कार्यकर्ताओं द्वारा मिटटी का नमूना लिया जाता है। यह ऐप राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लिए विकसित अन्य जियोटैंगिग ऐप की तरह काम करता है। ऐप में किसानों के नाम, आधार कार्ड नंबर, मोबाइल नंबर, लिंग, पता, फसल विवरण आदि दर्ज होता है।

श्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि सॉयल हेल्थ कार्ड किसानों को मिट्टी की पोषक तत्व संबंधित स्थिति के बारे में जानकारी प्रदान करता है और साथ ही मिट्टी के स्वास्थ्य व उर्वरता में सुधार करने के लिए उचित मात्रा में उपयोग किए जाने वाले पोषक तत्वों की सलाह देता है। हर दो साल में मिट्टी की स्थिति का आकलन किया जाता है ताकि पोषक तत्वों की कमी का पता लगाया जा सके और सुधार किया जा सके। श्री सिंह ने कहा कि असंतुलित उर्वरकों के प्रयोग के कारण भी खेत की मिटटी खराब हो जाती है और इसकी उत्पादन क्षमता कम होने लगती है। केन्द्रीय कृषि मंत्री ने इस मौके पर जानकारी दी कि प्रथम चरण (2015 से 2017) में अभी तक 10 करोड़ स्वायल हेल्थ कार्ड वितरित किए गए हैं। कृषि मंत्रालय का लक्ष्य दिसंबर, 2017 के अंत तक सभी 12 करोड़ किसानों को स्वायल हेल्थ कार्ड प्रदान करना है। इस योजना का दूसरा चरण, 1 मई 2017 से शुरु हुआ और वर्ष 2017 से 2019 के लिए है। उन्होंने कहा कि प्रति दो वर्ष के बाद नवीकरण के काम का यह सिलसिला चलता रहेगा।

केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि स्वायल हेल्थ कार्ड की प्रमुख विशेषताओं में नमूने एकत्र करने एवं प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए एक समान दृष्टिकोण अपनाना, देश में सारी भूमि को कवर करना और हर दो वर्ष में स्वायल हेल्थ कार्ड जारी करना शामिल हैं। यह योजना राज्य सरकारों के सहयोग से चल रही है। मिट्टी में होने वाले परिवर्तनों को मॉनिटर करने और इनकी तुलना पिछले वर्षों से करने के लिए एक पद्धतिबद्ध डाटाबेस तैयार करने वास्ते जीपीएस आधारित मिट्टी नमूना संग्रहण को अनिवार्य कर दिया गया है। श्री सिंह ने आगे बताया कि नमूनों के ऑनलाइन पंजीकरण और परीक्षण परिणामों को सॉयल हेल्थ कार्ड के राष्ट्रीय पोर्टल पर अपलोड किया जाता है। परीक्षण के परिणामों के आधार पर इस सिस्टम द्वारा स्वतः ही सिफारिशों की गणना की जाती है।

श्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि स्वायल हेल्थ कार्ड 14 स्थानीय भाषाओं में तैयार किया जाता है और किसानों को वितरित किया जाता है। उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि स्थानीय बोली में सॉयल हेल्थ कार्ड तैयार करने का काम शुरू हो चुका है। अब सॉयल हेल्थ कार्ड कुमाऊनी, गढ़वाली, खासी, गारो जैसी- स्थानीय बोलियों में भी तैयार किए जा सकते हैं। श्री सिंह ने कहा कि कार्ड में दी गई सलाह के अनुसार किसानों को अपने खेतों में पोषक तत्वों का उपयोग करना चाहिए। इससे खेती की लागत में कमी आएगी, उत्पादन और किसानों की आय में वृद्धि होगी।

श्री सिंह ने जानकारी दी कि स्वायल हेल्थ कार्ड पोर्टल को अब समेकित उर्वरक प्रबंधन सिस्टम (आई-एफएमएस) से जोड़ दिया गया है और सॉयल हेल्थ कार्ड सिफारिश के अनुसार उर्वरकों के वितरण का कार्य पॉयलेट आधार पर 16 जिलों में शुरू कर दिया गया है। यहां उल्लेखनीय है कि विश्व मृदा दिवस पर सॉयल हेल्थ के बारे में जागरूकता उत्प्न्न करने के लिए राज्य स्तर पर सभी जिलों में कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। हरियाणा में मृदा स्वास्थ्य कार्ड की प्रगति के बारे में केन्द्रीय कृषि मंत्री ने बताया कि प्रथम चरण में 43.6 लाख किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान करना था जिसके तहत 28.92 लाख किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किया जा चुका है। शेष कार्ड वितरित किये जा रहे हैं। सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम के प्रचार – प्रसार के लिए विभिन्न कार्यों का आयोजन राज्य सरकारों और आईसीएआर, इसके संस्थानों और कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा किया जा रहा है।